मालदीव संबंधों में नई गर्माहट: क्या मोदी सरकार ने मोइज़ू सरकार को झुका लिया या खुद झुक गई?

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29 July 2025 (Publish: 02:10 PM IST)

लेखक: शम्स तबरेज़ क़ासमी / मिल्लत टाइम्स न्यूज़ नेटवर्क

मालदीव और भारत के बीच पिछले दो वर्षों में खिंचाव, तनाव और फिर अचानक आई गर्मजोशी ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक गलियारों में खासी हलचल पैदा कर दी है। एक तरफ़ वह दौर था जब मालदीव से ‘India Out’ के नारे लग रहे थे, वहीं अब वही देश भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपने 60वें स्वतंत्रता दिवस पर गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर बुलाता है, और मोदी जी वहां जाकर दिवेही भाषा में ट्वीट करते हैं, जनता को संबोधित करते हैं, और मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मोइज़ू से एक के बाद एक समझौते करते हैं।

इस बदलाव ने सोशल मीडिया पर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि झुका कौन? भारत या मालदीव?

दो साल पहले का मालदीव: ‘इंडिया आउट’ और चीन की तरफ झुकाव
वर्ष 2023 में जब मोहम्मद मोइज़ू ने मालदीव में चुनाव लड़ा, तो उनका प्रमुख नारा था ‘इंडिया आउट’। भारत की सैन्य मौजूदगी पर सवाल उठाए गए, और इसे देश की संप्रभुता के खिलाफ बताया गया। उन्होंने चीन के साथ बेहतर रिश्तों की वकालत की और इसी बुनियाद पर चुनाव जीता। उनके सत्ता में आने के बाद मालदीव की सरकार और मीडिया, भारत के मानवाधिकार रिकॉर्ड, खासकर मुस्लिम अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों पर खुलकर बोलने लगे। भारत के खिलाफ अख़बारों में हेडलाइन बनीं, टीवी पर डिबेट हुए और नेताओं के तीखे बयान आए।
भारत की ओर से उस वक़्त कोई औपचारिक जवाब नहीं आया, सिवाय प्रधानमंत्री मोदी द्वारा लक्षद्वीप की यात्रा के, जिसे कूटनीतिक रूप से एक इशारा माना गया कि अगर मालदीव ने भारत से दूरी बनाई तो भारत अपने ही द्वीप लक्षद्वीप को टूरिज्म हब बनाकर मालदीव की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचा सकता है।
भारत की संयमित रणनीति और मालदीव की वापसी
मोइज़ू सरकार ने चीन से नज़दीकी बढ़ाई, मालदीव का एक आइलैंड 50 साल के लिए लीज़ पर चीन को दे दिया, और बड़े पैमाने पर चीनी निवेश व इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं शुरू हुईं – जिनमें एक विशाल पुल भी शामिल है। लेकिन चीन के बढ़ते प्रभाव के साथ-साथ क्षेत्रीय शक्ति संतुलन की चिंता भी बढ़ी। भारत ने न तो प्रतिक्रिया में कोई तीखी प्रतिक्रिया दी, न कोई पब्लिक डिप्लोमैसी चलाई, बल्कि धीरे-धीरे एक सक्रिय कूटनीति अपनाई। इसका नतीजा यह रहा कि मालदीव के 60वें स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर आमंत्रित किया गया – यह एक ऐसा आमंत्रण है जो राजनीतिक संकेतों से भरा है।

दिवेही भाषा में ट्वीट और जनता से सीधा जुड़ाव:
प्रधानमंत्री मोदी ने सिर्फ एक राजनयिक यात्रा नहीं की, बल्कि उन्होंने मालदीव की आधिकारिक भाषा – दिवेही में ट्वीट कर यह संदेश दिया कि भारत मालदीव के साथ रिश्तों को जनता के स्तर पर मजबूत बनाना चाहता है।

उन्होंने लिखा: “मालदीव के आवाम, हुकूमत, सदर मोहम्मद मोइज़ू और सिक्योरिटी इदारों का शुक्रिया, जिन्होंने इस दौरे को कामयाब बनाने के लिए दिन-रात मेहनत की…”
एक और ट्वीट में मोदी ने लिखा: “मालदीव की 60वीं यौमे आजादी की तकरीबात में शिरकत करना मेरे लिए बाइस फख्र है। दोनों देशों के बीच दोस्ती और तरक्की का अक्स इन आयोजनों में साफ झलकता है।”

रणनीतिक अहमियत और चीन की चुनौती
भारत की चिंता केवल रिश्तों की गर्मजोशी भर नहीं है, बल्कि हिंद महासागर में चीन के बढ़ते दबदबे को लेकर भी है। मालदीव जैसे छोटे द्वीपीय देश में अगर चीन अपनी सैन्य मौजूदगी बना लेता है, तो यह भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बड़ा खतरा बन सकता है।
खाड़ी देशों से भारत आने वाला तेल और व्यापारिक माल इसी समुद्री रास्ते से आता है। ऐसे में मालदीव में चीन की उपस्थिति भारत की एनर्जी सिक्योरिटी और समुद्री निगरानी को चुनौती दे सकती है। बीबीसी उर्दू की एक रिपोर्ट में भारत के पूर्व राजनयिकों और विशेषज्ञों के हवाले से कहा गया है कि मालदीव में भारत की मजबूत मौजूदगी आवश्यक है। ORF के वरिष्ठ फेलो मनोज जोशी कहते हैं कि “जहां मालदीव स्थित है, वहां से खाड़ी और पूर्वी एशिया तक की लेन गुजरती है, और भारत को इन रास्तों पर अपनी पकड़ बनाए रखनी होगी।”
क्या अब रिश्ते सामान्य हो गए हैं?
यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत और मालदीव के बीच सब कुछ सामान्य हो गया है। भले ही प्रधानमंत्री मोदी का यह दौरा प्रतीकात्मक रूप से बेहद सफल रहा हो, लेकिन मालदीव में अब भी चीन का प्रभाव बना हुआ है, और राष्ट्रपति मोइज़ू की पार्टी के कई नेता भारत के खिलाफ बयान देते रहे हैं। भारत ने जिस संयम, समझदारी, और राजनयिक चातुर्य से यह रिश्ता संभाला, उसकी तारीफ की जानी चाहिए। अब देखना यह है कि क्या यह गर्मजोशी स्थायी ताल्लुकात में तब्दील होती है या फिर यह एक अस्थायी सियासी ज़रूरत है।

निष्कर्ष: कौन झुका?

अगर यह पूछा जाए कि भारत झुका या मालदीव, तो जवाब इतना आसान नहीं। भारत ने शायद दिखावटी ताकत नहीं दिखाई, लेकिन धीरे-धीरे और रणनीतिक तरीके से अपने प्रभाव को फिर से कायम किया। वहीं मालदीव, जिसने कभी ‘India Out’ का नारा दिया था, आज उसी भारत को गले लगाता दिख रहा है। असल में यह कूटनीति की जीत है, और यह दिखाता है कि बातचीत, संयम और रणनीतिक धैर्य से बड़े भू-राजनीतिक संकट भी सुलझाए जा सकते हैं।

वीडियो लिंक नीचे है:-

https://youtu.be/a3YS_Rw-vEk?si=2SOQqgzU2fwdRyyN

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